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Saturday, July 9, 2016

उसको तो फ़र्क पड़ता है



एक बार समुद्री तूफ़ान के बाद हजारों लाखों मछलियाँ किनारे पर रेत पर तड़प तड़प कर मर रहीँ थीं ! इस भयानक स्थिति को देखकर पास में रहने वाले एक 6 वर्ष के बच्चे से रहा नहीं गया, और वह एक एक मछली उठा कर समुद्र में वापस फेकनें लगा ! यह देख कर उसकी माँ बोली, बेटा लाखों की संख्या में है, तू कितनों की जान बचाएगायह सुनकर बच्चे ने अपनी स्पीड और बढ़ा दी, माँ फिर बोली बेटा रहनें दे कोई फ़र्क नहीं पड़ता !

बच्चा जोर जोर से रोने लगा और एक मछली को समुद्र में फेकतें हुए जोर से बोला माँ "इसको तो फ़र्क पड़ता है" दूसरी मछली को उठाता और फिर बोलता माँ "इसको तो फ़र्क पड़ता हैं" ! माँ ने बच्चे को सीने से लगा लिया !

हो सके तो लोगों को हमेशा होंसला और उम्मीद देनें की कोशिश करो, न जानें कब आपकी वजह से किसी की जिन्दगी वदल जाए! क्योंकि आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता पर "उसको तो फ़र्क पड़ता है!"...

Wednesday, September 23, 2015

सफल जीवन क्या होता है


एक बेटे ने पिता से पूछा – पापा ये ‘सफल जीवन’ क्या होता है ?

पिता, बेटे को पतंग उड़ाने ले गए।
बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था…

थोड़ी देर बाद बेटा बोला, पापा.. ये धागे की वजह से पतंग और ऊपर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें !! ये और ऊपर चली जाएगी…

पिता ने धागा तोड़ दिया ..

पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आइ और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई…
तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया .,,,,
बेटा..
‘जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं
जैसे :घर, परिवार, अनुशासन, माता-पिता आदि और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं… वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं.. इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो बिन धागे की पतंग का हुआ…’
“अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना..”
” धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही ‘सफल जीवन’ कहते हैं

Tuesday, July 10, 2012

स्नेह का महत्व


जीव कितना ही सूक्ष्म हो या विशाल सभी के प्रति स्नेह का भाव रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। प्यार का दूसरा रूप होता है 'स्नेह'। यह ऐसा प्यार है जो हमें हमारे सद्गुणों के कारण मिलता है। यह एक तरह का प्रतिदान होता है, अर्थात बदले में मिला प्यार।

'स्नेह' आप किसी से जिद से नहीं पा सकते, उसके लिए आपको स्वयं उस रस सागर में गोता लगाना होगा। हम अपने से बड़ों को सम्मान और छोटों को प्यार देगें तो हमारे बीच का स्नेह स्रोत कभी सूख नहीं पाएगा। प्यार का हलका-सा स्पर्श रोते हुए व्याक्ति के होठों पर मुस्कान दे सकता है, उसके तनाव की बदली को छांट देता है। स्नेह में पगे हुए स्वर किसी को सुख का अहसास दे जाते हैं, उसके मन को निर्मल कर जाते हैं।

Monday, January 30, 2012

क्या तुम मनुष्य हो?



प्रेम में तुम्हारी जितनी गहराई हो, मनुष्यता में उतनी ही ऊंचाई होगी. और परिग्रह में जितनी ऊंचाई हो, मनुष्यता में उतनी ही क्षुद्रता होगी. प्रेम और परिग्रह जीवन की दो दिशाएं हैं. प्रेम पूर्ण है, तो परिग्रह शून्य हो जाता है. और जिनके चित्त परिग्रह से घिरे रहते हैं, प्रेम वहां आवास नहीं करता है.

एक साम्राज्ञी ने मृत्यु उपरांत उसकी कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तियां लिखने का आदेश दिया था : "इस कब्र में अपार धनराशि गड़ी हुई है. जो व्यक्ति अत्यधिक निर्धन और अशक्त हो, वह उसे खोद कर प्राप्त कर सकता है.”

उस कब्र के पास से हजारों दरिद्र और भिखमंगे निकले, लेकिन उनमें से कोई भी इतना दरिद्र नहीं था कि धन के लिए किसी की कब्र खोदे. एक अत्यंत बूढ़ा और दरिद्र भिखमंगा तो उस कब्र के पास ही वर्षो से रह रहा था और उधर से निकलने वाले प्रत्येक दरिद्र व्यक्ति को उस पत्थर की ओर इशारा कर देता था.

फिर अंतत: वह व्यक्ति भी आ पहुंचा जिसकी दरिद्रता इतनी थी कि वह उस कब्र को खोदे बिना नहीं रह सका. वह व्यक्ति कौन था? वह एक सम्राट था और उसने उस देश को अभी-अभी जीता था. वहां आते ही उसने कब्र को खोदने का कार्य शुरू कर दिया. उसने थोड़ा भी समय खोना ठीक नहीं समझा. पर उस कब्र में उसे क्या मिला? अपार धनराशि की जगह मिला मात्र एक पत्थर, जिस पर खुदा हुआ था : "मित्र, क्या तुम मनुष्य हो?”

निश्चय ही जो मनुष्य है, वह मृतक को सताने के लिए कैसे तैयार हो सकता है! लेकिन जो धन के लिए जीवित को भी मृत बनाने को सहर्ष तैयार हो, उसे इससे क्या फर्क पड़ता है!

निराश और अपमानित हो उस कब्र से लौटते समय उस सम्राट ने वहां रहने वाले बूढ़े भिखमंगे को जोर से हंसते हुए देखा. वह भिखमंगा कह रहा था, "मैं कितने वर्षो से प्रतीक्षा करता था, अंतत: आज पृथ्वी पर जो दरिद्रतम निर्धन और सर्वाधिक अशक्त व्यक्ति है, उसके भी दर्शन हो गए.”

प्रेम जिस हृदय में नहीं है, वही दरिद्र है, वही दीन है, वही अशक्त है. प्रेम शक्ति है, प्रेम संपदा है, प्रेम प्रभुता है. प्रेम के अतिरिक्त जो किसी और संपदा को खोजता है, एक दिन उसकी ही संपदा उससे पूछती है : "क्या तुम मनुष्य हो?”
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